अनुसंधान उपलब्धियाँ
प्राकृतिक पुनर्जनन को प्रभावित करने वाले कारकों पर अध्ययन
राई व तोष के प्राकृतिक पुनर्जनन को प्रभावित करने वाले कारकों जिनमें बीज प्रसार, बीज अंकुरण व पौध संस्थापन शामिल है, का विस्तृत अध्ययन किया गया तथा असफल प्राकृतिक पुनर्जनन क्षेत्रों के लिए कृत्रिम पृनर्जनन की वैकल्पिक प्रणाली का राज्य वन विभागों को सुझाव दिया गया
तोष के जंगल- एक झलक
राई जंगल
बीज अंकुरण पर अध्ययन
हिमालयन पेंसिल सेडार (जूनीपेरस पोलीकार्पोस) के बीजों में निष्क्रियता भेदन के लिए तकनीक विकसित की तथा दस हजार से अधिक पौध-उत्पाद विभिन्न संस्थानों को वितरित किये जाए रहे है
देवदार में आनुवंशिक परिवर्तनशीलता
देवदार की पन्द्रह समुदायों की अनुवंशीक परिवर्तनशीलता का आइसो-एनज़ाइम विष्लेषण द्वारा अध्ययन करने पर विविधता एवं विभेदीकरण, पर संयुग्मन तथा अनुवंशिक दूरियों पर शोध किया । चूंकि इन समुदायों का विभिन्न भौगोलक क्षेत्रों से उदगम हुआ तथा यह विभिन्न भूवैज्ञानिक संरचनाओं को अधिगृहीत करते हैं, तथापि एलोज़ाइमिक परिवर्तन ने समुदायिक मापदंडो के आधार पर इन आबादियों को समूह के आधार पर विभाजित करने की क्षमता दर्शाई तथा यह सारे समुदाय तीन समूहों में मिल गए
क) शंकु- वृक्ष प्रजातियां
1. . रई तथा तोष प्रजातियाँ अपने प्राकृतिक पुनर्जनन की असफलता तथा इसकी मानकीकरण पौधशाला तकनीक की अनुपलब्धता के कारण एक लंबे समय से वन विभाग के लिए कौतूहल का कारण बने रहे है। पौधशाला तकनीक का स्तरीकृत करने के लिए परीक्षण, बीज परिपक्वता सूचकांक का अध्ययन किया गया और शंकु के कृत्रिम विधि से पकने पर कार्य किया गया। बीज रोपाई के अंतर व गहराई सहित कमरतोड़ रोग से बचाव पर प्रोटोकाल स्थापित किये गए। प्रत्यारोपण तकनीक को स्तरीकृत किया गया। बीज बुवाई के लिए अपेक्षित छाया की जरुरत का निर्धारण किया तथा उपयुक्त छाया पर्दान करने वाले सामन्ती विकसित किया गया । बाहरी रोपण के लिए पौधशाला स्टाक का स्तरीकरण और पौधरोपण तकनीक: बाहरी पौधरोपण के लिए रई-तोष के अंकुरों की आयु व आकार का स्तरीकृत किया। बाहरी पौधरोपण के लिए लागत प्रभावी तकनीक पर कार्य किया
नर्सरी बेड में रई-तोष का प्रत्यारोपण मोडल
नसरी बेड में प्रत्यारोपित तोष
Tनसरी बेड में प्रत्यारोपित राई
2. राई व तोष की अनावृत्त जड़ों वाले पौधे उगाने के लिए पौधशाला तकनीक स्तरीकृत की गई और राज्य वन विभाग, हि.प्र. को हस्तांतरित की
3. शंकुधारी अर्थात् देवदार, रई व तोष के कंटेनरीकृत पौधों को तैयार करने के लिए पौधशाला तकनीक स्तरीकृत की
4. देवदार के लंबे पौधों को तैयार करने के लिए सफलतापूर्वक तकनीक विकसित की तथा उपयोगकर्ताओं को तकनीक उपलब्ध करवाई
ख) चौड़ी पत्तीदार प्रजातियां
शंकुधारी के चौड़ी पत्तीदार सहायकों की साथ नर्सरी तकनीक जैसे हिमालयन पॉपलर ( पोपलर सिलिएटा), खरसू ओक (क्वारकस सेमीकार्पिफोलिया), मोहरू ओक (डायलटेरा), बर्डचेरी (प्रूनस कारनेटा), ख़नोर (अॅसकुलस इंडिका) और मेपल (एसर सीज़ियम) का विकास किया गया
बीज उत्पादन क्षेत्रों की स्थापना
हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर में विद्यमान बीज स्टैंड सहित वन क्षेत्रों का सर्वेक्षण किया गया तथा चीड़ के बीज उत्पादन क्षेत्रों को स्थापित किया गया
- बीज उत्पादन क्षेत्र (चीड़ पाइन) : हि.प्र. – 50.96 है. | जे एंड के – 15.00 है.
चीर-पाइन का एसपीए
चीर-पाइन
का एसपीए
बीज बगीचों की स्थापना
हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर में चीड़ पाइन के सी.पी.टी. चुनने के लिए वन क्षेत्रों का सर्वेक्षण किया गया तथा एकत्रित बीजों का प्रयोग अंकुर बीज के बगीचों को स्थापित करने के लिए किया गया। क्लोनल सामग्री क्लोनल बीज बगीचा तथा बहुलीकरण बाग स्थापित करने के लिए उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर तथा पंजाब से शीशम चिन्हित सी.पी.टी. के क्लोनल सामग्री एकत्र की।
- क्लोनल बीज बगीचा (शीशम) : हि.प्र. – 4.5 है. | जे एंड के – 3.5 है.
- अंकुर बीज के बगीचे (चीड़ पाइन) : जे एंड के - 3.5 है.
- बहुलीकरण बाग़ (शीशम) : : हि.प्र. – 5.00 है.
चीर-पाइन (पाईनस
रोक्षबरगाई) का सीपीटी
शीशम (डालबरजिया सिस्सू) का सीएसओ/span>
देवदार के बीज स्टैंड
देवदार के 50 हे. बीज स्टैंड की गणना उनके बीज उत्पादन क्षेत्रों में रूपांतरण के लिए की गई। छंटनी कार्य निष्पादन के लिए चयनित बीज स्टैंड की अंक सूचियां राज्य वन विभाग को प्रस्तुत की गईं। इस प्रजाति के 77 सीपीटी वृक्ष चुने गए तथा 52 सीपीटी श्रेणियों के साथ प्रजनक ट्रायल स्थापित किये गए ।
शीशम के उत्तम क्लोन की पहचान: विकास प्रदर्शन, दबाव,
प्रतिरोध तथा कीट प्रतिरोध के आधार पर शीशम की उत्पादकता वृद्धि हेतु 16 उत्तम क्लोन का चयन किया गया ।
सैलिक्स क्लोन की जांच
सैलिक्स के 14 विदेशी क्लोन तथा छः उद्गम स्थानों की जांच, उनकी उंचाई-विकास प्रदर्शन तथा एफिड हमलों के विषेष संदर्भ में नाशिकीटों संबंधी घटनाओं के प्रति उनकी प्रतिरोध क्षमता को मध्य नज़र रख कर की। जहां तक उंचाई विकास का संबंध है, सेलिक्स कोएरूलिया सर्वोतम निर्वाहक था जबकि यू डबल्यू यू-2 प्रस्तावित क्लोनों में मुख्य रनर था
शीत मरूभूमियों का वनीकरण
- शीत मरूभूमि क्षेत्रों में स्वदेशी प्रजातियों तथा प्रजाति समूहों को पहचानने और इन प्रजातियों के साथ रोपण अभ्यास हेतु सर्वेक्षण किया गया
- हिमाचल प्रदेश में जूनिपेर वाले क्षेत्रों का सर्वेक्षण इसके संरक्षण स्तर का आकलन करने के लिए किया गया
- शीत मरूभूमि क्षेत्रों के लिए उपयुक्त कुछ स्वदेशी प्रजातियों तथा क्वारकस इलेक्स, हिप्पोफे रेमनाइड्स और फ्रैक्सिनस प्रजातियों सहित नर्सरी तकनीक विकसित की गई
- हिमाचल प्रदेश तथा जम्मू कश्मीर के शीत मरूभूमियों का फलोरिस्टक सर्वेक्षण किया गया तथा शीत मरूभूमियों से अद्वितीय फलोरा एकत्र किया
हिपोफेए रेमोनोएड़
शीत मरुस्थल- एक गाँव
शीत मरुस्थल- एक गाँव
जूनिपर प्रजाति
शीत मरूभूमियों की पांच प्रसिद्ध स्वदेशी प्रजातियों की नर्सरी तकनीक के मानकीकरण से खुलासा हुआ कि अप्रैल के दौरान स्वस्थ प्रौढ़ पौधों से एकत्र किए गए 20 से 30 सेमी. शूट, नए बढ़ रहे एलिगनस एंगस्टीफोलिया को आइ.बी.ए के 5000 पीपीएम से 6000पीपीएम सांद्रता में मृदा व रेत में त्वरित लेपन विधि के प्रयोग से पोली हाउस में 90 प्रतिशत से अधिक रूटिंग दी। जबकि मृदा माध्यम में खुली नर्सरी में 6000 पीपीएम से 7000 पीपीएम सांद्रता ने 70प्रतिशत से अधिक रूटिंग दी। रूटिंग के बाद, सुदृढ़ीकरण के लिए सभी पौधों को खुली नर्सरी की क्यारियों में आगामी बढ़ते मौसम के दौरान रखा गया





एल्पाइन चारागाहों का प्रबंधन
चुने हुए एल्पाइन चारागाहों में प्रजाति रचना के निर्धारण] पौध जैवभार तथा शुद्ध प्राथमिक उत्पादन का पारिस्थितक अध्ययन किया गया
अल्पाइन अध्ययन
जम्मू कश्मीर राज्य के जिला लद्दाख के हेमिस उच्च तुगंता राष्ट्रीय पार्क पर अध्ययन
इस अध्ययन से जिम्नोस्पर्म तथा एंजियोस्पर्म के 59 परिवारों में फैले 215 वंषों से संबंधित 458 टाक्सा के आकलन का पता चला। इस सूची के विष्लेषण से पता चलता है कि अध्ययन क्षेत्र में एस्टरएष परिवार 29 वषों से संबंधित 74 टाक्सा सहित फूलों वाले पौधों में सबसे प्रमुख परिवार है। प्रजातियों के विकास के विष्लेषण से पता चलता है कि कुल फलोरा का 92.36 प्रतिशत(423 टाक्सा) जड़ी-बूटी के साथ मुख्य रूप से घास का फलोरा है, जिसके बाद 5.24 प्रतिशत झाड़ीयां (24 टाक्सा) और 2.40 प्रतिशत वृक्ष (11 टाक्सा) आते हैं। एस्टरएष मुख्य परिवार है जिसमें 29 वंशो तथा 74 प्रजातियां हैं, यह पी.ए के फलोरा का 16.2 प्रतिशत बनता है जो उत्तर-पश्चिमी हिमालय के पार फलोरा के साथ समझौते में है
खनन क्षेत्रों का पुर्नवास
हिमाचल प्रदेश की पांवटा घाटी (जिला सिरमौर) में चुने हुए खनन क्षेत्रों का सर्वेक्षण किया गया और समीपवर्ती गांवों में सामाजिक आर्थिक स्तर का आकलन किया तथा इन खनन से प्रभावित पुर्नवास के लिए माडल विकसित किये।
खनन प्रभावित क्षेत्र
खनन विकास- एक दृश्य
पुनर्सथापित खनन क्षेत्र - एक दृश्य
पुनर्सथापित खनन क्षेत्र - एक दृश्य
हिमाचल प्रदेश में पारिस्थितिक आकलन, पर्वतीय बांसों के क्लोनल स्टॉक का संग्रहण व स्थापना
पर्वतीय बांसों के पारिस्थितक अध्ययन से पता चलता है कि अरूनडिनेरिया फॅलकॅटा, बान ओक और देवदार वनों, विषेषकर जहां वृक्ष छत्र प्राकृतिक रूप से टूटा है, में मामूली घने से झाड़-झंखाड़ का रूप लेता है जबकि टी.स्पेथिफलोरस देवदार, स्प्रूस तथा ओक वनों में सामान्यतः बड़े पैचों में बनता है। राज्य में पर्वतीय बांसों अर्थात् ए.फॅलकॅटा व टी. स्पेथिफलोरस की केवल दो प्रजातियों की जंगली आबादी विद्यमान है। इन दो प्रजातियों के पौधे हिमाचल प्रदेश के विभिन्न स्थानों से एकत्र किए गए थे और भ्रूणधार अनुसंधान केंद्र के समीपवर्ती वनक्षेत्र तथा कोटगढ़ वन प्रभाग के कुमारसेन रेंज के अन्तर्गत छिछड़ वन क्षेत्र में प्रत्येक 2 हेक्टर क्षेत्र पर क्लोनल स्टॉक स्थापित किए गए। स्थापित किए गए क्लोनल तट स्थानीय जनता तथा कारीगरों को पौधरोपण निरूपण के तौर पर मदद करेंगे।
हिमाचल प्रदेश के जिला किन्नौर के शीत मरूभूमियों में पौध विविधता
जिला किन्नौर, हिमाचल प्रदेश के पूह उप प्रभाग के शीत मरूभूमियों के विभिन्न क्षेत्रों में 2700-5000 मी. के विभिन्न उन्नतांषों में अध्ययन किया गया जिससे पता चला कि 47 परिवारों और 127 पीढ़ीओं से संबंधित कुल 191 पौध प्रजातियां लबरंग क्षेत्र में, 49 परिवारों और 134 पीढ़ीओं से संबंधित 191 प्रजातियां लिप्पा असरंग क्षेत्र में, 55 परिवारों व 136 पीढ़ीओं से संबंधित 192 प्रजातियां पूह क्षेत्र, 51 परिवारो और 119 पीढ़ीओं से संबंधित 160 प्रजातियां रोपा-जियावुंग क्षेत्र में, 49 परिवारों व 105 पीढ़ीओं से संबंधित 142 प्रजातियां नामगिया क्षेत्र और 41 परिवार व 101 पीढ़ीओं से संबंधित 130 प्रजातियां हांगों क्षेत्र में हैं। अध्ययन से क्षेत्र में 114 औषधीय पौधों की मौजूदगी भी ज्ञात हुई। इन औषधीय पौधों में से, 24 प्रजातियां संकटग्रस्त पौधे की श्रेणी में आती हैं।
स्सुसोरिया गोशिपिफोरा
अफीडरा जिरारर्डियाना
जिला किन्नौर, हिमाचल प्रदेश के रकछम-छितकुल वन्यजीव अभ्यारण्य की पौध विविधता
जिला किन्नौर, हिमाचल प्रदेश के रकछम-छितकुल वन्यजीव अभ्यारण्य में पादप-समाजशास्त्रीय अध्ययन व सर्वेक्षण किया गया और 70 परिवारों व 162 पीढ़ीओं से संबंधित 322 पौधों की प्रजातियां अभिलेखित की गई। अध्ययन में औषधीय महत्व की 98 पौध प्रजातियों की मौजूदगी भी शामिल की गई। अभ्यारण्य से संकटग्रस्त श्रेणी की 22 प्रजातियां अभिलेखित की गईं जिनमें से 3 गंभीर रूप से लुप्तप्राय: 11 लुप्तप्राय और 13 लुप्तप्राय होने की चपेट में थीं।
मेक्क्नोप्सिस अकुलेटा
ससुरिया ओबुलेटा
हिमाचल प्रदेश के कोल डैम जलविद्युत परियोजना के अन्तर्गत आने वाले वन क्षेत्रों का पारिस्थितिक आकलन
जलविद्युत परियोजना स्थलों का सर्वेक्षण संचालित किया गया था। तथापि, कोल डैम जलविद्युत परियोजना स्थल जो उप-उष्णकटिबंधीय से उप-षीतोष्ण क्षेत्र में आता है, से 77 परिवारों तथा 194 पीढ़ीओं से संबंधित 227 पौध प्रजातियों की मौजूदगी का पता चला। जब राज्य में ही सूक्ष्म-जलवायु के तौर पर विचार किया गया औषधीय महत्व के 129 पौधों की मौजूदगी अभिलेखित की गई। पौध प्रजातियां यथा -जन्थोज़ाइलम अर्माटम, ग्लोरिओसासुपर्बा, रोलियासिनेरिया, वलेरियाना जटामांसी, टैक्सस वलीचिआना संकटग्रस्त औषधीय पौधें की श्रेणी में आती हैं।
केसिया फिस्टुला
पुनिका ग्रेनेटम
जिला चंबा, हिमाचल प्रदेश के कालाटोप-खजियार वन्यजीव अभ्यारण्य में फलोरिस्टिक विविधता का पारिस्थितिक आकलन
कालाटोप-खजियार वन्यजीव अभ्यारण्य में, 76 परिवारों तथा 218 पीढ़ीओं से संबंधित कुल पौध प्रजातियों की संख्या 232 थी। मुख्य परिवार एस्टेरसी, रोजेसी, फेबेसी, लेमिनसी, पोएसी, रेनूकुलेसी तथा पोलीगोनेसी कालाटोप-खजियार वन्यजीव अभ्यारण्य में अभिलेखित 100 औषधीय पौधों में से 7 प्रजातियां जैसे: सीनामोनुम ट्माला, डिस्कोरिया डेल्टोइडीया, पेरिस पोलीफाईला, पोडोफाईलम हेक्सेन्दृम, पोलिगुनेटुम वेरटीसिलेट्म, टेक्सेस वालीचियाना, जेनथोजाइलम अरमानेटम संकटग्रस्त औषधीय पौधें की श्रेणी में आती हैं।
पोडोफाईलम हेक्सेन्दृम
डिजिटेलिस परपूरिया
चौड़ी पत्ती वाली प्रजातियों के कीटों पर अध्ययन
पॉपलर शूट बोरर (Eucosma glaciata) के जीवन चक्र का अध्ययन किया गया तथा इसके नियंत्रण उपायों का मानकीकरण किया गया। Populus deltoides की विभिन्न क्लोनों एवं P. ciliata की विभिन्न उत्पत्तियों पर बीटल द्वारा होने वाले नुकसान का मूल्यांकन भी किया गया।
पॉपलर में रोग
पॉपलर में रोग
शंकुधारी प्रजातियों के कीटों पर अध्ययन
देवदार पर लगभग 60 कीट प्रजातियाँ विभिन्न वृद्धि अवस्थाओं में अलग-अलग स्तर की क्षति पहुँचाती हैं, जिनमें Ectropis deodarae को सबसे अधिक हानिकारक कीट माना गया है तथा इसके नियंत्रण उपाय सुझाए गए हैं।
देवदार वृक्ष एक जड़ सड़न रोग से भी प्रभावित पाए गए, जो Phytopthora cinnamomi द्वारा उत्पन्न होता है। इसे Trichoderma viridae नामक जैविक नियंत्रण एजेंट के प्रयोग से नियंत्रित किया जा सकता है।
Ectropis deodarae का पूर्ण विकसित लार्वा
Phytopthora cinnamomi से देवदार की मृत्यु
हरियाणा एवं हिमाचल प्रदेश राज्यों में चीड़ वृक्षों की मृत्यु का मुख्य कारण चार प्रकार के तना छेदक कीट पाए गए, जिनमें Sphaenoptera aterrima, Cryptorhynchus rufescens, Platypus biformis तथा Polygraphus longifolia सम्मिलित हैं। इनके नियंत्रण उपाय भी सुझाए गए।
चीड़ वृक्षों की मृत्यु
चीड़ में तना छेदक कीट
हिमाचल प्रदेश एवं जम्मू-कश्मीर में Pinus wallichiana (कैल) के सूखने का कारण Pityogenes scitus नामक भृंग कीट का प्रकोप पाया गया। इसके प्रबंधन हेतु जैविक नियंत्रण एजेंट की प्रभावशीलता पर कार्य किया जा रहा है।
हिमाचल प्रदेश के शीत मरुस्थलीय क्षेत्रों जैसे सिस्सो, खंगसर, गोंधला, केलांग एवं स्टिंगरी में विलो वृक्षारोपण की भारी क्षति का मुख्य कारण जल स्रोतों की कमी पाया गया। साथ ही, प्रभावित वृक्षों में 'Large Willow Aphid' Tuberolachnus salignus (Homoptera: Aphidoidea: Lachnidae) का भारी संक्रमण देखा गया। एकल फसल प्रणाली को समाप्त करने, वैकल्पिक जल प्रवाह की व्यवस्था करने तथा कुछ संपर्क कीटनाशकों के प्रयोग जैसी प्रबंधन पद्धतियाँ सुझाई गई हैं।
विलो की नई शाखा पर एफिड
विलो शाखा पर पूर्ण विकसित एफिड
मृत विलो वृक्ष
चीड़ वनों में छाल एवं लकड़ी छेदक कीट समूह का प्रबंधन
प्रजाति के महत्व तथा छाल एवं लकड़ी छेदक कीटों से उत्पन्न वास्तविक खतरे को ध्यान में रखते हुए, चीड़ की 7 उत्पत्तियों (Provenances) का क्षेत्रीय परीक्षण किया गया तथा Polygraphus longifolia, Ips longifolia, Cryptorhynchus rufescens एवं Sphaenoptera aterrima जैसे तना छेदक कीटों के आक्रमण के प्रति उनका मूल्यांकन किया गया। गिरी गम्भर उत्पत्ति (58%) तथा कांगड़ा घाटी (53.2%) सबसे अधिक संवेदनशील पाई गईं, जबकि सीर कुनार खुड्ड (8.1%) तथा ब्यास घाटी (7.0%) सबसे कम प्रभावित पाई गईं।
Dalbergia sissoo में कीट–रोग संकुल का नियंत्रण
शीशम (Dalbergia sissoo) की 40 उत्पत्तियों (Provenances) का प्राकृतिक परिस्थितियों में यादृच्छिक ब्लॉक डिजाइन के अंतर्गत Ganoderma जड़ सड़न एवं दीमक के प्रति परीक्षण किया गया। रैम्पुर उत्पत्ति, जिसमें केवल 2.0 प्रतिशत वृक्ष मृत्यु दर्ज की गई, प्रतिरोधी पाई गई तथा पौधों की ऊँचाई एवं वक्ष ऊँचाई पर व्यास (DBH) के आधार पर पाँचवीं सर्वश्रेष्ठ उत्पत्ति रही।
देवदार पर्णभक्षी Ectropis deodarae Prout. (Lepidoptera: Geometridae) का प्रबंधन
देवदार वनों के विनाशकारी पर्णभक्षी कीट Ectropis deodarae के प्रबंधन हेतु एक समेकित कीट प्रबंधन (IPM) मॉडल विकसित किया गया। पर्ण क्षति की जटिल समस्या, ऊँचे पर्वतीय क्षेत्र तथा इस कीट के अनियमित प्रकोप के बावजूद, प्रकोप की स्थिति में वानिकी, यांत्रिक एवं जैविक नियंत्रण उपायों को अपनाकर इस कीट का प्रभावी प्रबंधन संभव पाया गया।
Ips longifolia भृंग आक्रमण हेतु फेरोमोन प्रौद्योगिकी
Ipsdienol ((s)-2-methyl-6mehtyleneocta-2,7-dien-4-0l) @ 8 mg युक्त Fero-T™ (फेरोमोन ट्रैप) को चीड़ वृक्षारोपण में I. longifolia Steb. (Coleoptera: Scolytidae) की जनसंख्या नियंत्रण में प्रभावी पाया गया। एक हेक्टेयर वृक्षारोपण क्षेत्र में 12-20 फेरोमोन ट्रैप आवश्यक पाए गए।
चीड़ वनों में Polygraphus longifolia भृंग का प्रबंधन
95 – 110 सेमी लंबाई, 90 – 100 सेमी GBH तथा 25 से 35 प्रतिशत नमी युक्त वृक्ष-फंदा (Tree-trap) भृंगों को आकर्षित करने में प्रभावी पाया गया।
Thysanoplusia orichalcea (Lepidoptera: Noctuidae) का नियंत्रण — Saussurea costus (कुठ) का एक गंभीर पर्णभक्षी कीट
Saussurea costus में T. orichalcea की जनसंख्या को आर्थिक क्षति स्तर से नीचे बनाए रखने हेतु नीम खली @ 500 ग्राम / मी², Grownim @ 5.0% तथा समर ऑयल @ 5.0% प्रभावी पाए गए।
- कृषि वानिकी की दृष्टि से महत्वपूर्ण देशी बहुउपयोगी प्रजातियाँ जैसे Grewia optiva (भ्यूल), Ulmus laevigata, Bauhinia variegata (कचनार) तथा तीव्र वृद्धि वाली विदेशी प्रजातियाँ, जिनमें मुख्यतः Populus deltoides (क्लोन G3 एवं G48) शामिल हैं, का नर्सरियों में संवर्धन किया गया तथा निर्धारित कृषि वानिकी मॉडल के अनुसार पांवटा घाटी एवं बाथ घाटी के चयनित गाँवों के किसानों को रोपण हेतु वितरित किया गया।
- किसानों के खेतों में उपयुक्त कृषि वानिकी मॉडल विकसित किए गए तथा वर्ष 1993-2000 के दौरान तकनीकी जानकारी सहित 5 लाख से अधिक पॉपलर ETPs किसानों को निःशुल्क वितरित किए गए।
हि.प्र. की पहाड़ियों में पारंपरिक कृषि वानिकी पद्धति
विकसित कृषि वानिकी मॉडल
उच्च पर्वतीय समशीतोष्ण क्षेत्रों के लिए अंतरफसली मॉडल:
हाल तक हिमाचल प्रदेश में समशीतोष्ण फलों की खेती एक लाभकारी व्यवसाय थी, किन्तु अनियमित वर्षा, अत्यंत कम हिमपात, विभिन्न कीट एवं रोगों की बढ़ती घटनाएँ, क्षेत्र में बढ़ते तापमान तथा घटते वन क्षेत्रों के कारण फल फसलों की लगातार विफलता देखी गई। इसके अतिरिक्त, सेब वृक्षों में शीतकाल के दौरान आवश्यक शीत अवधि (Chilling Hours) में कमी आने से पुष्पन एवं फल गठन प्रभावित हुआ, जिसके परिणामस्वरूप उत्पादन एवं गुणवत्ता दोनों में गिरावट आई। इन परिस्थितियों ने किसानों एवं बागवानों को आय में वृद्धि हेतु वैकल्पिक एवं विविधीकृत विकल्पों की ओर प्रेरित किया।
संस्थान ने इस दिशा में कार्य करते हुए वैज्ञानिक आधार पर व्यावसायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण औषधीय पौधों जैसे Aconitum heterophyllum (अतीस), Valeriana jatamansi (मुष्कबाला), Picrorhiza kurrooa (कुटकी), Polygonetum verticillatum (सलाम मिश्री) तथा Angelica glauca (चोरा) के लिए उच्च पर्वतीय समशीतोष्ण क्षेत्रों में बागवानी वृक्षारोपणों के साथ उपयुक्त अंतरफसली मॉडल विकसित किए। इन मॉडलों से किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ प्रति इकाई भूमि की उत्पादकता में भी वृद्धि हुई।
“पर्वतीय बाँस - ग्रामीण आजीविका सुधार हेतु एक महत्वपूर्ण संसाधन” पर राष्ट्रीय संगोष्ठी
यह संगोष्ठी 17 से 18 अक्टूबर, 2014 को मनाली में आयोजित की गई। कार्यशाला में राज्य वन विभागों, विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों, गैर-सरकारी संगठनों आदि के विशेषज्ञों एवं प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
"पर्वतीय बाँस उत्पाद प्रदर्शनी एवं शिल्प मेला"
यह आयोजन 16.10.2014 से 20.10.2014 (5 दिवस) तक वन्यजीव सूचना एवं व्याख्या केंद्र (एम.सी. कार्यालय के निकट), मनाली, जिला कुल्लू, हिमाचल प्रदेश में आयोजित किया गया। प्रदर्शनी में उत्तराखंड एवं हिमाचल प्रदेश के लगभग 25 बाँस शिल्पकारों ने अपने उत्पाद प्रदर्शित किए।
“वन पारिस्थितिकी तंत्र में कीट एवं रोग: उनकी घटनाएँ एवं प्रबंधन” विषय पर संगोष्ठी
यह संगोष्ठी 25 एवं 26 मई, 2011 को HFRI, शिमला में आयोजित की गई। कार्यशाला में राज्य वन विभागों, विश्वविद्यालयों तथा अनुसंधान संस्थानों आदि के विशेषज्ञों एवं प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
‘भारतीय वानिकी अनुसंधान सूचना प्रणाली (IFRIS) पर तृतीय ई-चैंपियन कार्यशाला एवं प्रशिक्षण’
यह कार्यशाला 29 सितम्बर, 2008 से 3 अक्टूबर, 2009 तक हिमालयन फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट, शिमला (हि.प्र.) में आयोजित की गई। कार्यशाला में ICFRE मुख्यालय एवं सभी ICFRE संस्थानों के ई-चैंपियनों ने भाग लिया।
“उत्तर-पश्चिमी हिमालय में वन कीट एवं रोग प्रबंधन” विषय पर संगोष्ठी
यह संगोष्ठी 10 एवं 11 जनवरी, 2008 को HFRI, शिमला में आयोजित की गई। कार्यशाला में विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों, राज्य वन विभागों आदि के विशेषज्ञों एवं प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
‘भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) अनुप्रयोग द्वारा सतत भूमि उपयोग योजना’ विषय पर कार्यशाला
यह कार्यशाला हिमाचल प्रदेश सरकार के राज्य भूमि उपयोग बोर्ड (SLUB) द्वारा प्रायोजित थी तथा 7 सितम्बर 2007 को HFRI, शिमला में आयोजित की गई। कार्यशाला में राज्य वन विभागों, विश्वविद्यालयों, रिमोट सेंसिंग, भारतीय वन सर्वेक्षण तथा अनुसंधान संस्थानों आदि के विशेषज्ञों एवं प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
“उत्तर-पश्चिमी हिमालय में कृषि वानिकी की स्थिति एवं संभावनाएँ” विषय पर कार्यशाला
यह कार्यशाला हिमाचल प्रदेश सरकार के राज्य भूमि उपयोग बोर्ड एवं राज्य वन विभाग द्वारा प्रायोजित थी तथा 14 से 16 नवम्बर, 2006 तक HFRI, शिमला में आयोजित की गई। कार्यशाला में राज्य वन विभागों, विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों आदि के विशेषज्ञों एवं प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
“वानिकी विस्तार रणनीति समीक्षा” पर क्षेत्रीय कार्यशाला
यह कार्यशाला 27 दिसम्बर, 2005 को HFRI, शिमला में आयोजित की गई। कार्यशाला में हिमाचल प्रदेश राज्य के वन विभाग, विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों तथा कृषि, उद्यानिकी, पशुपालन एवं ग्रामीण विकास विभागों के अधिकारियों एवं विशेषज्ञों ने भाग लिया।
हितधारकों के साथ संवाद
“वानिकी अनुसंधान में बेहतर समन्वय विकसित करने” हेतु संस्थान द्वारा प्रतिवर्ष कार्यशालाएँ एवं हितधारक बैठकें आयोजित की जाती हैं। इन बैठकों में हिमाचल प्रदेश एवं जम्मू-कश्मीर के राज्य वन विभागों के अधिकारी, विश्वविद्यालयों एवं अनुसंधान संस्थानों के विशेषज्ञ, गैर-सरकारी संगठन तथा किसान आदि भाग लेते हैं।
पॉपलर पर कार्यशाला एवं सहकर्मी समीक्षा
इस कार्यशाला में ICFRE के सभी संस्थानों के वैज्ञानिकों तथा उन विश्वविद्यालयों के प्राध्यापकों ने भाग लिया, जहाँ ICFRE द्वारा अनुसंधान अनुदान परियोजनाएँ प्रदान की गई थीं।
चीड़ पर कार्यशाला एवं सहकर्मी समीक्षा
इस कार्यशाला में ICFRE के विभिन्न संस्थानों के वैज्ञानिकों के साथ-साथ विश्वविद्यालयों के प्राध्यापक तथा हिमाचल प्रदेश एवं जम्मू-कश्मीर के राज्य वन विभागों के अधिकारियों ने भाग लिया।
रोपण सामग्री सुधार कार्यक्रम पर प्रशिक्षण
राज्य वन विभाग, हिमाचल प्रदेश एवं जम्मू-कश्मीर के अधिकारियों को बीज उत्पादन क्षेत्र (Seed Production Areas), सीडलिंग सीड ऑर्चर्ड, क्लोनल सीड ऑर्चर्ड तथा वेजिटेटिव मल्टिप्लिकेशन गार्डन के बेहतर प्रबंधन हेतु प्रशिक्षण प्रदान किया गया।
पर्वतीय बाँस के संरक्षण पर प्रशिक्षण
हिमाचल प्रदेश वन निगम के अधिकारियों को पर्वतीय बाँस के बेहतर संरक्षण एवं प्रबंधन हेतु एक स्व-वित्तपोषित प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित कर प्रशिक्षण प्रदान किया गया।
वन कीट विज्ञान एवं जैविक नियंत्रण पर कार्यशाला एवं सहकर्मी समीक्षा
इस कार्यशाला में ICFRE के विभिन्न संस्थानों के वैज्ञानिकों तथा विश्वविद्यालयों के प्राध्यापकों ने भाग लिया।
अनुसंधान उपलब्धियों का अंतिम उपयोगकर्ताओं तक प्रसार
अनुसंधान निष्कर्षों के प्रसार हेतु विभिन्न वन विभागों के रेंज अधिकारियों, फॉरेस्टरों, वन रक्षकों, विश्वविद्यालय/महाविद्यालय/विद्यालय के छात्रों तथा किसानों के लिए संस्थान के भ्रमण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
अनुसंधान प्राथमिकता निर्धारण पर कार्यशाला
संस्थान के अधिकार क्षेत्र में आने वाले क्षेत्रों के लिए वानिकी अनुसंधान प्राथमिकताओं को निर्धारित करने हेतु एक कार्यशाला आयोजित की गई, जिसमें देशभर के वन अधिकारी, विश्वविद्यालयों के प्राध्यापक तथा वैज्ञानिकों ने भाग लिया।
राज्य वृक्ष का उत्सव
देवदार को हिमाचल प्रदेश एवं जम्मू-कश्मीर का राज्य वृक्ष घोषित किया गया है। भारत की स्वतंत्रता के 50वें वर्ष के उपलक्ष्य में विद्यालय स्तर पर क्विज प्रतियोगिता, स्थल पर चित्रकला, निबंध लेखन आदि कार्यक्रम आयोजित किए गए तथा Sacred Heart Public School, Tara Hall, शिमला में बच्चों को इस वृक्ष के महत्व एवं प्रासंगिकता के बारे में जानकारी दी गई।
विद्यालयी विद्यार्थियों हेतु कार्यक्रम
संस्थान द्वारा विद्यालय एवं महाविद्यालय के विद्यार्थियों के लिए पर्यावरण जागरूकता कार्यक्रम नियमित रूप से आयोजित किए जाते हैं। इन कार्यक्रमों के माध्यम से विद्यार्थी क्षेत्र की वनस्पति एवं जीव-जंतुओं, महत्वपूर्ण सुगंधित एवं औषधीय पौधों तथा उनके उपयोग, हर्बेरियम तैयार करने की विधि, मूलभूत उपकरणों के उपयोग तथा सूचना प्रौद्योगिकी (IT) में नवीन प्रगति आदि से परिचित होते हैं।
किसानों हेतु कार्यक्रम
UNDP कार्यक्रम के अंतर्गत संस्थान द्वारा किसानों के लिए पंतनगर विश्वविद्यालय तथा रुद्रपुर (उत्तराखंड) स्थित WIMCO का भ्रमण कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिससे उन्हें कृषि वानिकी से संबंधित नवीन तकनीकी ज्ञान प्राप्त हो सके। संस्थान द्वारा हिमाचल प्रदेश के पांवटा साहिब एवं सुंदरनगर में किसान मेलों का भी आयोजन किया गया। इसके अतिरिक्त हिमाचल प्रदेश एवं जम्मू-कश्मीर के किसानों के लिए फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट, देहरादून, हर्बल मार्केट हरिद्वार, हारा फार्म्स जगाधरी तथा UHF रिसर्च सेंटर धौलाकुआँ (पांवटा साहिब) के अध्ययन भ्रमण भी आयोजित किए गए।
ग्रामीण महिलाओं का सामाजिक-आर्थिक उत्थान
IDRC परियोजना के अंतर्गत हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में खनन गतिविधियों से प्रभावित महिलाओं के लिए सिलाई प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए।
संस्थान की गतिविधियों का प्रदर्शन
हिमाचल प्रदेश वन विभाग के सहयोग से सौरभ वन विहार, पालमपुर में एक व्याख्या केंद्र (Interpretation Centre) स्थापित किया गया है, जहाँ संस्थान की अनुसंधान उपलब्धियाँ, विकसित तकनीकें तथा संचालित परियोजनाएँ स्व-व्याख्यात्मक प्रदर्शनियों के रूप में प्रदर्शित की गई हैं।
प्रदर्शनी (डेमोन्स्ट्रेशन) प्लॉट्स
संस्थान द्वारा अंतिम उपयोगकर्ताओं के लिए विभिन्न प्रदर्शन प्लॉट्स विकसित एवं संधारित किए गए हैं। इनमें प्रमुख रूप से 'लाइमस्टोन माइन पुनर्वास प्लॉट, बल्दवा', 'पॉपलर प्रदर्शन प्लॉट, पांवटा एवं पीरदी विहाल, कुल्लू', 'शीशम एवं चीड़ के बीज बागान', 'शीशम का वानस्पतिक गुणन उद्यान, बिरपलासी (नालागढ़)', 'चिलगोजा पाइन का वृक्षारोपण', 'जिला सोलन में 100 हेक्टेयर डेंड्रोकेलामस हैमिल्टोनी प्रदर्शन प्लॉट', 'लाहौल में सैलिक्स के प्रदर्शन प्लॉट', 'G. arborea के प्रदर्शन प्लॉट, जोहरोन (पांवटा साहिब) एवं कोट (हमीरपुर) हिमाचल प्रदेश में तथा जम्मू-कश्मीर में सांबा एवं नुड्ड में', तथा हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा एवं कुल्लू जिलों में पॉलोनिया के प्रदर्शन प्लॉट शामिल हैं।
हर्बेरियम
हर्बेरियम की स्थापना जुलाई, 2000 में की गई थी। संस्थान ने पश्चिमी हिमालय क्षेत्र से लगभग 1500 पादप प्रजातियों (सही पहचान सहित) का संग्रह किया है, जो लगभग 135 कुलों (families) से संबंधित हैं। संग्रह का प्रमुख क्षेत्र विशेष रूप से शीत मरुस्थल (cold deserts) रहा है; इसके अतिरिक्त उच्च शीतोष्ण क्षेत्र (शिमला जिला), रुपी भाभा वन्यजीव अभयारण्य, दुर्गम चंबा क्षेत्र, ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क (कुल्लू), चूड़धार वन्यजीव अभयारण्य (सिरमौर) तथा लोअर हिमाचल के बद्दी क्षेत्र भी शामिल हैं। हर्बेरियम में लगभग 6000 नमूने (specimens) हर्बेरियम शीट्स पर व्यवस्थित एवं चिपकाए गए हैं। 28 औषधीय पौधों की प्रजातियों की पहचान की गई है जो रेड डेटा बुक में सूचीबद्ध हैं। संस्थान द्वारा FRI हर्बेरियम एवं BSI हर्बेरियम, देहरादून को 125-125 नमूनों का योगदान दिया गया है। अन्य कार्यों में विभिन्न संस्थानों (वर्तमान में FSI, शिमला) के लिए शुल्क आधारित वाउचर नमूनों की पहचान, हर्बेरियम शीट्स की बिक्री तथा विद्यार्थियों एवं आगंतुकों को हर्बेरियम निर्माण विधि के बारे में शिक्षित करना शामिल है।
एट्रोपा बेलाडोना
साइप्रिपीडियम (Cypripedium spp.)
आइरिस (Iris spp.)
फेरुला जेश्केआना (Ferula jaeshkeana)
पेडिकुलैरिस (Pedicularis spp.)
हेराक्लियम लैनाटम (Heracleum lanatum)
रयूम मूरक्रॉफ्टियानम (Rheum moorcroftianum)
एफेड्रा जेरार्डियाना (Ephedra gerardiana)
मेकोनोप्सिस एक्युलेटा (Meconopsis aculeata)
पोडोफिलम हेक्सांड्रम (Podophyllum hexandrum)
स्वर्टिया पेटियोलाटा (Swertia petiolata)
हिपोफे राम्नोइड्स (Hippophae rhamnoides)
क्लेमाटिस तिबेटाना (Clematis tibetana)
बर्जीनिया स्ट्रैची (Bergenia stracheyi)
अर्नेबिया गुटलाटा (Arnebia gutlata)
टैरेक्सैकम ऑफिसिनाले (Taraxacum officinale)
डिजिटालिस परप्यूरिया (Digitalis purpurea)
रोसा मैक्रोफिला (Rosa macrophylla)
जस्टिसिया अधाटोडा (Justicia adhatoda)
गेजिया एलेगेंस (Gagea elegans)
पश्चिमी हिमालयी शीतोष्ण वृक्षोद्यान की स्थापना:
वृक्षोद्यान (Arboretum) प्रजातियों के बाह्य-स्थल (ex-situ) संरक्षण की एक महत्वपूर्ण विधि है। वृक्षोद्यान वैज्ञानिक रूप से सुव्यवस्थित वृक्षीय पादप प्रजातियों जैसे वृक्ष, झाड़ियाँ एवं काष्ठीय लताओं का संग्रह होता है, जो विभिन्न जलवायु एवं पादप-भौगोलिक क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करता है। ये विभिन्न उद्देश्यों जैसे जर्मप्लाज्म संग्रह, बागवानी अध्ययन तथा बाह्य-स्थल पौध संरक्षण के माध्यम के रूप में कार्य करते हैं। सुव्यवस्थित एवं सौंदर्यपूर्ण रूप से डिज़ाइन किए गए वृक्षोद्यान समाज में पौधों के प्रति जागरूकता बढ़ाने तथा संरक्षण शिक्षा को प्रोत्साहित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बाह्य-स्थल संरक्षण एवं दुर्लभ प्रजातियों का सामूहिक प्रवर्धन, वनस्पति उद्यान में की जाने वाली गतिविधियाँ, प्राकृतिक आवास (in-situ) संरक्षण के पूरक होती हैं।
वन विहार में स्थापित यह वृक्षोद्यान बहुआयामी उपयोग वाला होगा, जिसमें प्रमुख रूप से अनुसंधान, शिक्षा, पर्यावरण जागरूकता एवं इको-टूरिज्म शामिल हैं। यह मनोरंजनात्मक गतिविधियों हेतु भी उपयोगी होगा, जिससे समाज एवं जैव विविधता के बीच परस्पर संवाद को बढ़ावा मिलेगा। स्थापित होने पर यह क्षेत्र का पहला बाह्य-स्थल पौध संरक्षण केंद्र होगा तथा उत्तर-पश्चिमी हिमालय में इस प्रकार के चुनिंदा संरक्षण उद्यानों में से एक होगा। यह क्षेत्र के शौकिया एवं व्यावसायिक बागवानी समुदाय के लिए अनुसंधान एवं प्रवर्धन सुविधाओं का एक महत्वपूर्ण केंद्र प्रदान करेगा।
यह वृक्षोद्यान (Arboretum) नीति-निर्माताओं के बीच कृषि-जैव विविधता के महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाने में भी योगदान देगा, विशेष रूप से उन उपेक्षित या कम उपयोग की जाने वाली प्रजातियों के संदर्भ में, जिससे इस समूह की प्रजातियों पर अधिक ध्यान दिया जा सके। इसके अन्य उपयोगों में भूदृश्य (landscaping) तथा समुदायों के सांस्कृतिक एवं कलात्मक मूल्यों को बनाए रखने में प्रजातियों की भूमिका भी शामिल होगी।
वृक्षोद्यान में शामिल अधिकांश पादप प्रजातियाँ आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होंगी, जिनमें इमारती लकड़ी देने वाले पौधे, खाद्य फल एवं मेवे देने वाले पौधे, मसाले, रेशा, औषधीय तथा सजावटी पौधे आदि शामिल होंगे। काष्ठीय वनस्पतियों का यह अनूठा संग्रह लोगों, विशेषकर युवाओं को हमारे एक अत्यंत महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संसाधन ‘शीतोष्ण हिमालय की जैव विविधता’ के संरक्षण की आवश्यकता के प्रति जागरूक करने में अत्यंत सहायक सिद्ध होगा।
अन्वेषण एवं वन्य संग्रह:
वृक्षोद्यान (Arboretum) में पौधों का समृद्ध संग्रह संस्थान की विभिन्न अनुसंधान परियोजनाओं के अंतर्गत किए गए अनेक पादप अन्वेषण अभियानों के माध्यम से तैयार किया गया है, और यह कार्य आज भी संग्रह के विकास एवं संरक्षण, अनुसंधान तथा शिक्षा के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु निरंतर जारी है। वन्य आबादी से पौध सामग्री का संग्रहण इसे वैज्ञानिक अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण बनाता है, चाहे वह वृक्षोद्यान की जीवित संग्रह इकाई के लिए हो, हर्बेरियम हेतु प्रेस्ड नमूने के रूप में हो, या अनुसंधान परियोजनाओं के लिए जीवित जर्मप्लाज्म के रूप में।
यह गतिविधि आवास ह्रास तथा वैश्विक परिवर्तन की चुनौतियों के बीच देशज पौधों के बाह्य-स्थल (ex-situ) संरक्षण को भी समर्थन प्रदान करती है।
अवसंरचना विकास:
वृक्षोद्यान (Arboretum) में परिदृश्य (landscape) अवसंरचना को सुदृढ़ करने, जीवित संग्रह के महत्व को संकेत बोर्डों (signage) के माध्यम से प्रदर्शित करने, नियमित खाद एवं निराई-गुड़ाई द्वारा पौधों की वृद्धि की परिस्थितियों में सुधार करने तथा विषयगत पथों (thematic trails) के विकास के माध्यम से आगंतुकों के अनुभव को बेहतर बनाने के प्रयास किए गए हैं।
इसके अंतर्गत गार्ड हट का नवीनीकरण कर उसे फील्ड कार्यालय में परिवर्तित किया गया, दो गज़ेबो, एक पेर्गोला तथा आगंतुकों—विशेषकर विद्यालयी बच्चों—के साथ संवाद हेतु एक एम्फीथिएटर का निर्माण भी किया गया।
शिक्षा एवं प्रसार:
विद्यालयी बच्चों से लेकर विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं, पेशेवरों तथा स्थानीय समुदाय के सदस्यों तक, जो व्यक्तिगत एवं व्यावसायिक विकास के कार्यक्रमों में भाग लेते हैं, यह वृक्षोद्यान (Arboretum) पौधों एवं प्राकृतिक आवास के बारे में आजीवन सीखने का अवसर प्रदान करता है।
शिक्षा संबंधी प्रसार गतिविधियों में वर्तमान में बच्चों के लिए जागरूकता कार्यक्रम, व्याख्यान, स्थल पर चित्रकला/नारा लेखन प्रतियोगिताएँ तथा संस्थागत आगंतुक शिक्षा हेतु विभिन्न पहल शामिल हैं। एम्फीथिएटर के जुड़ने के साथ, अब वृक्षोद्यान संवादात्मक व्याख्यान/चर्चा सत्रों तथा बच्चों द्वारा लघु नाट्य प्रस्तुतियों के माध्यम से जैव विविधता संरक्षण से जुड़े उभरते मुद्दों को प्रभावी रूप से प्रस्तुत करने में अपनी भूमिका और अधिक सशक्त करेगा।
विद्यालय स्तर पर सीखने के अतिरिक्त, ये अनुभव बच्चों में तर्क क्षमता विकसित करने तथा जैव विविधता/पर्यावरण और दैनिक गतिविधियों के बीच तार्किक संबंध स्थापित करने में सहायता करते हैं। बाह्य कक्षाएँ (Outdoor classrooms) न केवल विद्यार्थियों को शीघ्र सीखने में मदद करती हैं, बल्कि उनमें ज्ञान साझा करने के मूल्य को भी विकसित करती हैं, जो इस वृक्षोद्यान (Arboretum) के उद्देश्य के केंद्र में है।
औषधीय पौधों की विभिन्न प्रजातियों के श्रेष्ठ आनुवंशिक स्टॉक की पहचान
Picrorhiza kurroa, Valeriana jatamansi Jones, Podophyllum hexandrum तथा Berberis aristata की विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों से प्राप्त आबादियों का स्क्रीनिंग कर (उच्च सक्रिय अवयवों की मात्रा के आधार पर) इनके श्रेष्ठ आनुवंशिक स्टॉक की पहचान की गई है।इन प्रजातियों के लिए जनसंख्या मूल्यांकन, सूक्ष्म आवास (micro habitat) का वर्णन तथा Field Gene Bank (FGB) की स्थापना का कार्य किया गया है। यह कार्य विशेष रूप से Picrorhiza kurroa, Valeriana jatamansi Jones तथा Podophyllum hexandrum के लिए संपन्न किया गया है।
हिमाचल प्रदेश के कुल्लू घाटी में पवित्र उपवनों (Sacred Groves) का अध्ययन
हिमाचल प्रदेश की कुल्लू घाटी में स्थित पवित्र उपवनों (Sacred Groves) में पाए जाने वाले औषधीय पौधों का दस्तावेजीकरण किया गया है। साथ ही कुल्लू घाटी के विभिन्न पवित्र उपवनों के संरक्षण हेतु स्थल-विशिष्ट प्रबंधन रणनीतियाँ भी सुझाई गई हैं।
हिमाचल प्रदेश में Picrorhiza kurrooa और Valeriana jatamansi की उपयुक्त संग्रहण सीमा का आकलन
हिमाचल प्रदेश के विभिन्न प्राकृतिक आवासों में Picrorhiza kurrooa तथा Valeriana jatamansi के लिए उपयुक्त (optimum) संग्रहण सीमा का आकलन किया गया है।
मैक्रो-प्रोपेगेशन तकनीकों का विकास
Picrorhiza kurrooa (कुटकी) तथा Valeriana jatamansi (मूषकबाला) जैसे शीतोष्ण हिमालय के महत्वपूर्ण औषधीय पौधों के बड़े पैमाने पर प्रवर्धन (mass multiplication) हेतु मैक्रो-प्रोपेगेशन तकनीकों का विकास किया गया है।
Aconitum heterophyllum (अतिश) तथा Angelica glauca (चोरा) के बड़े पैमाने पर उत्पादन हेतु उन्नत तकनीकों का विकास किया गया और इन्हें सफलतापूर्वक स्थानीय समुदायों को हस्तांतरित किया गया।
Atish, Kutki, Chora तथा Mushakbala के विभिन्न परियोजनाओं के अंतर्गत लगभग 9 लाख पौधशाला (nursery) पौध सामग्री का उत्पादन किया गया।
औषधीय पौधों का सूचीकरण एवं दस्तावेजीकरण
संस्थान द्वारा हिमाचल प्रदेश तथा जम्मू एवं कश्मीर राज्यों के विभिन्न पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील एवं नाजुक क्षेत्रों में व्यापक सर्वेक्षण किए गए तथा विभिन्न संकटग्रस्त श्रेणियों में आने वाले औषधीय पौधों का सूचीकरण एवं दस्तावेजीकरण किया गया।
जर्मप्लाज्म बैंक की स्थापना एवं प्रवर्धन तकनीकों का मानकीकरण
संस्थान द्वारा शीतोष्ण हिमालय की औषधीय पौधों की 30 प्रजातियों का जर्मप्लाज्म बैंक ब्रुंधर नर्सरी (मनाली) में स्थापित किया गया है। इसके अतिरिक्त 20 प्रजातियाँ शिली नर्सरी, सोलन में तथा 10-10 प्रजातियाँ शिल्लारू नर्सरी (शिमला) एवं मॉडल नर्सरी (शिमला) में प्रदर्शन एवं विभिन्न हितधारकों के लिए स्थापित की गई हैं। आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण औषधीय पौधों जैसे Picrorhiza kurrooa (कुटकी), Aconitum heterophyllum (पतीश), Valeriana jatamansi (मूषकबाला), Angelica glauca (चोरा) तथा Podophyllum hexandrum (बनकाकड़ी) आदि की नर्सरी तकनीकों के सुधार हेतु अध्ययन किए गए हैं। कुटकी एवं मूषकबाला के बड़े पैमाने पर प्रवर्धन हेतु मैक्रो-प्रोपेगेशन तकनीक का भी विकास किया गया है।